कॉल सैंटर पर पदस्थ स्टाफ की भाषा में अति नाटकीयता नजर आती है, लेकिन हम जो पल-पल नाटक करते हैं, उससे तो कम ही होती है। जेब में रखा मोबाइल घनघनाते ही हैलो से पहले नंबर पर नजर डालते हैं, पल भर में तय कर लेते हैं कितने सच में, कितना झूठ मिलाकर पूरा सच बोलने का नाटक करना है।
हमारी हालत तो यह हो गई है कि जब हमारा काम कहीं अटक रहा हो तो बोली में जाने कहां से मिठास आ जाती है और जब हमें एहसास हो जाए कि सामने वाले का काम हमारी हां के बिना होगा नहीं तो कलफ लगे कपड़ों से ज्यादा हमारी जबान कड़क हो जाती है।
शासकीय कार्यालयों के स्टाफ को लेकर पता नहीं यह आम धारणा कितनी सही है कि बिना किसी स्वार्थ के कर्मचारी विनम्र होते ही नहीं। इस धारणा का दुर्भाग्यजनक पहलु यह भी है कि जो कर्मचारी अपने कर्म और वाणी से सबके प्रिय बने होते हैं, उनके प्रति भी कई बार लोग गलत धारणा बना लेते हैं। रही निजी कार्यालयों की बात तो अपने सहकर्मियों पर रौब गांठने के लिए वरिष्ठ साथी बेमतलब जबान को कड़क बनाए रखते हैं। बॉस को पता तक नहीं चल पाता कि उसके नाम से कार्यालय की आबोहवा कितनी प्रदूषित की जा रही है।
परेशानी यह है कि हम कड़क या कटु सत्य सुनना पसंद नहीं करते, लेकिन साथी-सहयोगियों से बात करते वक्त भाषा में विनम्रता भी नहीं रखना चाहते। कॉल सैंटर के देवीदास को 8 से 10 घंटे की ड्यूटी में कम से कम 300 फोन अटैंड करने होते हैं। हर कॉल 3 से पाँच मिनट की तो होती ही है तब भी वह न तो संयम खोता है और न ही भाषा का सम्मान कम होने देता है। दूसरी तरफ हम लोग सबसे कम संवाद घर में और सर्वाधिक दुकान-संस्थान में आपस में करते हैं। हम बोली को गोली की तरह इस्तेमाल करते वक्त यह भी याद नहीं रखते कि ऐसा पलटवार हम पर हो गया तो? हम भूल जाते हैं कि रिश्तों में खटास तभी बढ़ती है जब बोली में मिठास नहीं रहती। आपने तो जबान हिलाई, जो मुंह में आया बोल दिया और आगे बढ़ गए लेकिन आपके शब्दों से किसका, कितना खून जला यह एहसास नहीं होता। क्योंकि जो आहत हुआ है वह अपना खून जलाना पसंद करता है, लेकिन फांस बनकर सीने में चुभ रही आपकी बोली पर खुलकर कुछ कहना पसंद नहीं करता। मुझे कई बार साफ कहना-सुखी रहना वाला सिद्धांत अच्छा तो लगता है फिर सोचता हूं लोग कटु बोलना तो छोड़ नहीं सकते, लेकिन कटु सत्य सुनने की हिम्मत भी नहीं रखते। उन लोगों के लिए कड़वा सच पचा पाना और मुश्किल होता है जो दिल-दिमाग से छोटे होते हैं।
ऐसे में तो यही बेहतर है कि बोली के घाव पनपने ही नहीं दें और कड़वा सच बोलने से पहले मन ही मन यह आंकलन कर लें कि सुनने वाला सच सहन कर भी पाएगा या नहीं। मलेरिया से मुक्ति के लिए तो कुनैन की गोली मन मारकर खाई जा सकती है, लेकिन कड़वी बोली कितने लोग पचा पाते हैं?
अगले हपते फैरूं, खम्मा घणी-सा...
