Wednesday, 11 November 2009

बोली में रहे मिठास तो रिश्तों में नहीं होगी खटास

अभी कुछ ऐसी मजबूरी हुई कि मुझे अपना एटीएम कार्ड पुनज् बनवाने की प्रक्रिया से गुजरना पड़ा। एसबीबीजे स्टाफ ने कार्ड संबंधी कुछ विशेष जानकारी देने के लिए बैंक के टोल फ्री नंबर पर बात करने की सलाह दी। गुजरात स्थित इस कॉल सेंटर पर पदस्थ देवीदास ने आवश्यक जानकारी देने के लिए मुझसे जितनी देर बातचीत की, मुझे सीखने को मिला कि जो लोग सार्वजनिक जीवन में हैं, उन्हें बेमतलब ही सही टोल फ्री नंबर डायल करके कॉल अटैंड करने वाले कर्मचारी के बोलचाल के सलीके से यह तो सीख ही लेना चाहिए कि हम रोजमर्रा के जीवन में क्या इतनी विनम्रता, आत्मीयता और संयम से बात कर पाते हैं। वैसे कॉल सैंटरों पर फोन लगाने वालों की कमी नहीं है, लेकिन ये नंबर क्वदोस्त बनाइएं वाले अधिक होते हैं।
कॉल सैंटर पर पदस्थ स्टाफ की भाषा में अति नाटकीयता नजर आती है, लेकिन हम जो पल-पल नाटक करते हैं, उससे तो कम ही होती है। जेब में रखा मोबाइल घनघनाते ही हैलो से पहले नंबर पर नजर डालते हैं, पल भर में तय कर लेते हैं कितने सच में, कितना झूठ मिलाकर पूरा सच बोलने का नाटक करना है।
हमारी हालत तो यह हो गई है कि जब हमारा काम कहीं अटक रहा हो तो बोली में जाने कहां से मिठास आ जाती है और जब हमें एहसास हो जाए कि सामने वाले का काम हमारी हां के बिना होगा नहीं तो कलफ लगे कपड़ों से ज्यादा हमारी जबान कड़क हो जाती है।
शासकीय कार्यालयों के स्टाफ को लेकर पता नहीं यह आम धारणा कितनी सही है कि बिना किसी स्वार्थ के कर्मचारी विनम्र होते ही नहीं। इस धारणा का दुर्भाग्यजनक पहलु यह भी है कि जो कर्मचारी अपने कर्म और वाणी से सबके प्रिय बने होते हैं, उनके प्रति भी कई बार लोग गलत धारणा बना लेते हैं। रही निजी कार्यालयों की बात तो अपने सहकर्मियों पर रौब गांठने के लिए वरिष्ठ साथी बेमतलब जबान को कड़क बनाए रखते हैं। बॉस को पता तक नहीं चल पाता कि उसके नाम से कार्यालय की आबोहवा कितनी प्रदूषित की जा रही है।
परेशानी यह है कि हम कड़क या कटु सत्य सुनना पसंद नहीं करते, लेकिन साथी-सहयोगियों से बात करते वक्त भाषा में विनम्रता भी नहीं रखना चाहते। कॉल सैंटर के देवीदास को 8 से 10 घंटे की ड्यूटी में कम से कम 300 फोन अटैंड करने होते हैं। हर कॉल 3 से पाँच मिनट की तो होती ही है तब भी वह न तो संयम खोता है और न ही भाषा का सम्मान कम होने देता है। दूसरी तरफ हम लोग सबसे कम संवाद घर में और सर्वाधिक दुकान-संस्थान में आपस में करते हैं। हम बोली को गोली की तरह इस्तेमाल करते वक्त यह भी याद नहीं रखते कि ऐसा पलटवार हम पर हो गया तो? हम भूल जाते हैं कि रिश्तों में खटास तभी बढ़ती है जब बोली में मिठास नहीं रहती। आपने तो जबान हिलाई, जो मुंह में आया बोल दिया और आगे बढ़ गए लेकिन आपके शब्दों से किसका, कितना खून जला यह एहसास नहीं होता। क्योंकि जो आहत हुआ है वह अपना खून जलाना पसंद करता है, लेकिन फांस बनकर सीने में चुभ रही आपकी बोली पर खुलकर कुछ कहना पसंद नहीं करता। मुझे कई बार साफ कहना-सुखी रहना वाला सिद्धांत अच्छा तो लगता है फिर सोचता हूं लोग कटु बोलना तो छोड़ नहीं सकते, लेकिन कटु सत्य सुनने की हिम्मत भी नहीं रखते। उन लोगों के लिए कड़वा सच पचा पाना और मुश्किल होता है जो दिल-दिमाग से छोटे होते हैं।
ऐसे में तो यही बेहतर है कि बोली के घाव पनपने ही नहीं दें और कड़वा सच बोलने से पहले मन ही मन यह आंकलन कर लें कि सुनने वाला सच सहन कर भी पाएगा या नहीं। मलेरिया से मुक्ति के लिए तो कुनैन की गोली मन मारकर खाई जा सकती है, लेकिन कड़वी बोली कितने लोग पचा पाते हैं?
अगले हपते फैरूं, खम्मा घणी-सा...

ठंडे दिमाग से सोचें कौन खरा, कौन खोटा

हमारे वार्ड और शहर का भाग्यविधाता होने लायक कौन है? प्रमुख राजनीतिक दलों ने तो तय कर दिया है, परंतु शहर के विकास की कसौटी पर कौन-कितना खरा उतरेगा यह वक्त बताएगा। एक पखवाड़ा है मतदाताओं के पास अपना नुमाइंदा चुनने के लिए, इतना समय कम नहीं होता।
घोषित किए गए प्रत्याशी क्या वाकई आपका नेतृत्व कर सकेंगे? राजनीतिक दलों ने इन्हें जिन खासियत के आधार पर प्रत्याशी घोषित किया है अधिकांश वार्डों के मतदाता इन प्रत्याशियों का रिकार्ड बेहतर जानते हैं। कैसे नेताओं की नजर में चढ़े, कैसे जुगाड़ करके टिकट कबाड़ा यह गुणगान तो दलों के वे ही दावेदार कर रहे हैं जिन्हें योग्य नहीं माना गया। हमारे नहीं चाहने के बावजूद अच्छे लोगों के साथ सट्टा, जुआ, अवैध शराब बिक्री, शांतिभंग जैसे आपराधिक प्रकरणों में उलझे प्रत्याशी भी मैदान में आ ही रहे हैं। किसे चुनना, किसे खारिज करना यह आपका अधिकार है। शपथ पत्रों में कितना सच होता है, यह झूठ भी छिपा नहीं है। वैसे भी आपको इन सबका कच्चा चिट्ठा मुंहजबानी याद तो है ही। कई वाडोZ में यह स्थिति भी बन सकती है जितने प्रत्याशी हैं, उन सब में अच्छाई ढूंढने से नहीं मिलेगी। तब सबसे आसान तरीका तो यही है कि मतदान ही नहीं किया जाए, पर यह हल नहीं है। फिर हमें कम बुराई वाले को चुनने की मजबूरी का पालन करना पड़ सकता है। ऐसा करते समय उस प्रत्याशी पर पूरे वार्ड के मतदाताओं का इतना दबाव भी हो कि वह चुनाव जीतने पर अदृश्य न हो।
जिन प्रत्याशियों को विभिन्न दलों ने चुनाव लड़ाना तय किया है, वे आपके वार्ड की समस्याओं को जानते भी हैं या नहीं। परिषद की बैठकों में पांच साल गूंगे-बहरे तो नहीं बने रहेंगे? अंगूठा छाप होना कलंक माना जाता है, इसलिए गांव-ढाणी में आदिवासी परिवार भी अपनी लड़कियों को शिक्षा दिलाने लगे हैं। ऐसे में आपका प्रत्याशी अंगूठा छाप कैसे हो सकता है। वह भी तब जब उसके निर्वाचन का निर्णय करने वाले वार्ड के अधिकांश मतदाता 12वीं या उससे ज्यादा पढ़े लिखे हों। वोट मांगने जो भी आए उससे इतना पूछने की हिम्मत नहीं, हमारा हक है कि वह बताए कहां तक पढ़ा है, आपराधिक प्रकरणों की क्या स्थिति है और उसे क्यों जिताया जाए? 23 नवंबर तक सब कुछ आपके हाथ में हैं। गलत चुनाव किया तो पांच साल हाथ मलते रहने के अलावा कुछ नहीं कर पाएंगे।

Thursday, 5 November 2009

उस शुभचिंतक का भी कुछ आभार व्यक्त करें

बात ज्यादा पुरानी तो नहीं है लेकिन मेरे मित्र के परिजनों जितना आश्चर्य मुझे भी है कि क्या ऐसी घटना के बाद भी कोई सही सलामत बच सकता है। हनुमानगढ़ से श्रीगंगानगर की ओर आ रहे हमारे मित्र जिस कार को ड्राइव कर रहे थे, अचानक उसका संतुलन सामने अंधगति से आ रहे एक ट्रक से बचने के चक्कर में गड़बड़ा गया। कार में बैठे अन्य तीन मित्र भी हक्के-बक्के रह गए।
गाड़ी ड्राइव कर रहे मित्र ने इस बेहद मुश्किल स्थिति में भी धैर्य नहीं खोया। ट्रक से जैसे-तैसे कार बचाई तो आगे अंधेरी सड़क पर लोहे के सरिए लादे एक ट्रैक्टर-ट्राली बिगड़ी हालत में खड़ी थी। मित्र ने उसी सजगता के साथ गाड़ी विपरीत दिशा में तेजी से मोड़ दी। उस तरफ विशालकाय पेड़ था, एक पल की देरी उन सभी मित्रों की असमय मौत का कारण बन सकती थी। मित्र ने फिर त्वरित निर्णय लिया और बाकी मित्रों की भयमिçश्रत चीख को अनसुना करते हुए उसी तेजी से गाड़ी सीधे हाथ की तरफ मोड़ दी।
मात्र कुछ मिनट जीवन और मौत के बीच चले इस खेल में उन चारों मित्रों को असमय होने वाली मौत के बाद की स्थिति का तो अहसास करा ही दिया था। इससे बढ़कर, जीवन रूपी उपहार कितना अनमोल है, इसका पता भी इन्हीं कुछ मिनटों में उन्हें लग गया था।
हम सबके साथ भी ऐसा कुछ अप्रत्याशित कभी ना कभी तो घटित हुआ ही है। तभी हम इसे अपनों की दुआ, ईश्वर की कृपा तो कभी यह कहकर याद रख लेते हैं कि अभी जिंदगी बाकी है, इसीलिए बच गए। कोई माने या ना माने लेकिन मैं मानता हूं कि ऐसी कोई अदृश्य शक्ति या ताकत है जो ऐसे बुरे वक्त में हमारी रक्षा करती है। यह ठीक है कि जिस दिन मौत लिखी होगी हल्की सी ठोकर या पानी पीते वक्त लगा ठसका भी इसका कारण बन जाएगा, लेकिन जब लगे कि क्वबस उस वक्त तो मर ही जाते, किसी चमत्कार से ही बच गएं तो मान लीजिए यह चमत्कार ही वह अदृश्य शक्ति है।
कभी किसी दिन सिर्फ इसी उद्देश्य से कुछ पल आंखें मूंदकर सोचें तो सही कि कितनी बार हमें ऐसे चमत्कारों से जीवनदान मिला। तो कुछ पल के लिए बंद आंखों में हमें फूलमाला चढ़ी अपनी तस्वीर दो-चार कोनों में तो नजर आ ही जाएगी।
वह कौन है जो हमें बचाता है? न हमारे पास उसका पता है और न ही उसके बारे में ज्यादा कुछ पता है। पर कोई तो है जो हम पर बुरी नजर रखने वालों पर नजर रखता है। कई बार जब एक्सीडेंट में अंग भंग हो जाए, तब भी हमारा इस अदृश्य ताकत से विश्वास नहीं उठेगा।
बशर्ते हमारी सोच पॉजिटिव रहे। हमें यह सोचकर संतोष करना ही होगा कि ऑयल डिपो में लगी भीषण आग में कुछ लोगों की मौत के बाद भी यदि कुछ कर्मचारी सिर्फ घायल हुए तो यह ऊपर वाले की कृपा ही है।
जो हम पर कृपा करते हैं, क्या हम उनके प्रति कृतज्ञता का भाव भी रखते हैं? यदि हम मन से ऐसा करने लगें तो ईसाई समाज की तरह प्रभु की पल-पल होने वाली कृपा के प्रति हमारे मन में भी कृतज्ञता का भाव हिलोरे मारने लगेगा। अच्छा देखने, अच्छा करने, अच्छा सोचने की ओर अग्रसर होंगे तो हमारे साथ बुरा होने पर भी हम उसमें अच्छा ढूंढने की दृष्टि पा सकेंगे। इसीलिए तो हमारे पुरखे कह भी गए हैं-जैसी दृष्टि वैसी सृष्टि! बीते हुए कल से सबक लेकर हम आने वाला कल तो बेहतर बना ही सकते हैं।
हमारे सुख-दुःख में जो मित्र-रिश्तेदार काम आते हैं, उनके प्रति तो हम फिर भी थैंक्स कहकर मैनर्स की कमी न होने का एहसास करा देते हैं लेकिन सुबह हमारे उठने से भी पूर्व से लेकर सोने के बाद तक जो जागता रहता है, उस अदृश्य शुभचिंतक के लिए हम क्या कर पाते हैं? मुझे लगता है उन्हीं लोगों को अच्छी नींद आती होगी जो रात को सोने से पहले प्रार्थना के माध्यम से अच्छे दिन के लिए आभार व्यक्त करने के साथ ही अगला दिन और बेहतर गुजरे, इसकी शुरुआत भी प्रार्थना से करते होंगे।
अगले हपते फैरूं, खम्मा घणी-सा...

Wednesday, 28 October 2009

सोचिए तो सही आप में भी है कुछ खासियत

वही मसाले, वही कत्था-चूना, पान पत्ता भी वही लेकिन टेस्ट में फर्क था तो इसलिए कि शंकरलालजी की अनुपस्थिति में परिवार के अन्य सदस्य ने पान लगाया था। गौशाला रोड स्थित पान की दुकान पर अकसर पान खाते रहने के कारण नए हाथों से लगाए पान के टेस्ट में फर्क एक पल में ही पता चल गया। चार पीढ़ियों से बाबा पान भंडार इस कारोबार में है। शंकरलालजी भी उन चेहरों की भीड़ में एक ऐसा चेहरा हैं जिनकी पहचान उनकी खासियत के कारण है।
किसी एक कार्य को कई लोग अलग-अलग तरीकों से करते हैं, लेकिन उस काम को बेहतर तरीके से करने के कारण कोई एक ही पहचान बना पाता है। अफसोस तो यह है कि हमें अपने आसपास के लोगों की खासियत भी तब पता चलती है, जब तुलना की स्थिति बन जाए। बुरे से बुरे आदमी में भी एक अच्छी बात तो होती ही है। हमारी नजर और उसके भाग्य का दोष होता है कि बुराइयों के पहाड़ तले उसकी यह खासियत इतनी दबी होती है कि हमें नजर नहीं आती।
पानी पिलाने के लिए हर वक्त तैयार रहने, हर समय मुस्कराते हुए मिलने, किसी की निंदा के वक्त चुप्पी साधे रहने, चाय अच्छी बनाने या बिना खाना खाए नहीं आने देने, किसी भी परेशानी में सबसे पहले पहुंचने, गंभीर और अपरिचित घायल के लिए भी चाहे जब रक्तदान के लिए तत्पर रहने जैसे कई कारणों से परिवार के किसी एक सदस्य की पहचान बन जाती है। इसी पहचान की रिश्तेदारी में बढ़-चढ़कर मिसाल भी दी जाती है।
क्या कभी सोचा हमने जब उस व्यक्त ने शुरू-शुरू में यह कार्य किया था, तब हममें से ही कई लोगों ने हंसी भी उड़ाई थी, मजाक में 'पागल हैं जैसे शब्द भी उछाले थे और कई बार उसके उत्साह का सार्वजनिक रूप से मजाक भी उड़ाया था। क्योंकि तब उस छोटे से काम को हमने व्यापक नजरिए से नहीं देखा था। महाभारत के कथा प्रसंगों में जिक्र है योगेश्वर श्रीकृष्ण ने जूठी पत्तलें उठाने का काम अपने लिए चुना था। स्वर्ण मंदिर में भी विश्व के सैकड़ों एनआरआई कुछ देर के लिए ही सही जूताघर में सेवा करके खुद को धन्य मानते हैं।
क्या हममें कोई खासियत है कि लोग हमें अपनी उस खासियत के कारण पहचानें? यूं तो समय की पाबंदी और कही हुई बात पूरी करना सबके लिए आसान नहीं, परंतु जिन लोगों ने इसे आदत बना लिया, उनके लिए ये सामान्य बात है। ऐसे में हम भी सोचें कि हम भीड़ का हिस्सा बनकर ही खत्म हो जाएंगे या अलग चेहरे के रूप में पहचान बनाएंगे। आज भी हमें अपने गांव, मोहल्ले के वो दादा, मामा, भुआजी, नानीजी याद हैं। मोहल्ले के किसी भी घर में शादी हो, भंडार की व्यवस्था उन्हें ही सौंपी जाती थी, शोक किसी भी परिवार में हो अथीü सजाने से लेकर चिता के लिए लड़कियां जमाने में उनकी ही सलाह मानी जाती थी। मोहल्ले में चाहे गाय ही अंतिम सांस ले रही हो गंगाजल नानीजी के घर से ही मिलता था। गांव में आने वाली बारात के लिए भुआजी खुद अपने विवेक से ही उस घर की बहू-बेटियों को इस अधिकार से हिदायत देती थीं कि बाहर से आए रिश्तेदार भी पहली बार तो यही मान लेते थे कि भुआजी ही घर की मुखिया हैं।
हम ऐसी कोई खासियत अपने में ढूंढ नहीं पाते तो उसके कई कारणों में एक कारण तो यही है कि हम कछुए की तरह खुद को खोल में समेटे रखते हैं, सामाजिक होना भूलते जा रहे हैं। इसीलिए दूसरों की खासियत देखकर भी खुद को बदलना नहीं चाहते। और तो और हम अपने बच्चों की खासियत को पहचानना भी भूलते जा रहे हैं. लिटिल चैंप, डांस इंडिया डांस जैसे रियलिटी शो हों या स्कूल, कॉलेज में किसी स्पर्द्धा में प्रथम आए स्टूडेंट। शायद ही कोई परिवार हो जो तत्काल रिएक्ट करता हो अपने बच्चों पर। क्षेत्र कोई सा हो शीर्ष पर कोई एक ही रहेगा और किसी एक में सारी ही खासियत हो यह भी संभव नहीं। अच्छा तो यही होगा कि हम खुद में और अपनों में खामियां तलाशने की अपेक्षा छोटी-मोटी खासियत को ढूंढने की कोशिश करें। क्वबाकी सब में सब कुछ हैं यह शोक मनाने से बेहतर तो यही होगा कि जो खासियत हम में है उसकी खुशी मनाएं और उसे ही अपनी पहचान बनाएं। साथी के पास 99 सिक्के हैं लेकिन हमारे पास एक ही सिक्का होना इसलिए भी खास है कि उस एक के बिना 99 सौ नहीं हो सकते।
अगले हपते फैरूं, खम्मा घणी-सा...

Wednesday, 21 October 2009

उपहार के तराजू में भावनाओं का तौल क्यों!

अभी कई मित्रों-अधिकारियों के बीच दीपावली पर मिलने-मिलाने का अवसर आया। यह देखकर अच्छा लगा कि कई दिनों से स्टाफ के बीच बधाइयों के साथ ही मिठाइयों का दौर चल रहा था। ऐसे ही एक कार्यालय में मेरे सामने भी एक हाथ में मिठाई और दूसरे में ड्राईफ्रूट का खुला पैकेट लिए कर्मचारी खड़ा था। मैंने मिठाई का एक पीस लेते हुए सहज ही पूछ लिया कि ये किस खुशी में? अधिकारी मित्र का जवाब था। बस ऐसे ही!
अब मेरी जिज्ञासा और बढ़ गई। मैंने फिर कुरेदा। कोई तो कारण है, बताइए तो सही। उनका जवाब सुनकर अच्छा लगा कि दीपावली तो है ही खुशियां बांटने का पर्व। इन दिनों मुलाकात के लिए जितने भी लोग आए हैं, कोई ड्राईफ्रूट, मिठाई तो कोई चॉकलेट का गिफ्ट पैकेट भी बधाई के साथ देकर जा रहा है। आखिर हम कितना खाएंगे और कितने दिन तक खाएंगे? सोचा क्यों न अपने साथियों के बीच खुशियां बांटी जाएं, लिहाजा कई दिनों से यह दौर चल रहा है। कुछ पैकेट तो अनाथाश्रम में भी भिजवा दिए।
मैंने सहज रूप से कहा-ये तो हमारे लिए अच्छी खबर हो सकती है। उनका जवाब था, 'इसमें खबर जैसा क्या है? मैंने अपने पास से क्या किया, ये पद और ये त्योहार ही ऐसा है कि लोग अपनी आत्मीयता दिखाने का अवसर छोड़ना ही नहीं चाहते।'
बात छोटी सी है। मुझे जो अच्छा लगा वह यह कि खुशियों को बांटने के तरीके तो कई हैं, लेकिन क्या हम ऐसा भी कर पाते हैं? ऐसा नहीं कि स्टाफ के साथियों या अनाथाश्रम के बच्चों को मिठाई का स्वाद पता नहीं है, लेकिन उपहार वाली खुशियों को प्यार से अपनों में बांटना भी छोटी बात नहीं है। जब हम छोटे थे तब जन्मदिन पर मिली चाबी वाली कार भले ही सात दिन में खटारा कर दी हो, लेकिन अपने छोटे भाई-बहन के हाथ लगा लेने पर भी पूरा घर आसमान पर उठा लेते थे, क्योंकि वह हमें बर्थडे में मिला गिफ्ट जो था।
बड़े होने के साथ ही हममें समझ भी बढ़ती जाती है और तब बचपन के ऐसे किस्सों को याद कर हंसी भी आती है। संस्कारों, संवेदना और सामाजिक ताने-बाने के बीच अब फूल, मिठाई, गिफ्ट पैक जैसे उपहारों के सहारे हम सम्मान एवं खुशी व्यक्त करने का कोई अवसर छोड़ना नहीं चाहते। बात सिर्फ खुशी व्यक्त करने की ही नहीं है, अब तो रिश्तों की टूटन और मजबूती में भी उपहारों की अहमियत बढ़ती जा रही है।
विवाह समारोह हो, रक्षाबंधन, भाईदूज हो या जन्मदिन, विवाह वर्षगांठ जैसे मंगल प्रसंग। हम सब अपेक्षा तो बहुत कुछ रखते हैं और जब अनुमान की तराजू पर उपहार का भार हल्का नजर आने लगता है तो मजबूत रिश्तों में भी दरार बढ़ने लग जाती है। शायद ऐसे ही कारणों से हमें वह निमंत्रण पत्र बहुत पसंद आते हैं जिनमें मोटे-मोटे अक्षरों में लिखा होता है-आपका आशीर्वाद ही हमारे लिए उपहार है।
वर्ष में ऐसे कई अवसर आते हैं, जब हमें अपनी हैसियत या उससे भी आगे जाकर कुछ ना कुछ करना ही पड़ता है। यह सब समाज और रिश्तों की मजबूती के लिए अनिवार्य सा लगता है। जहां अपेक्षा अधिक हो, वहां महंगे से महंगे उपहार का मूल्य भी कम ही आंका जाता है। हमारे एक नजदीकी परिवार ने रिश्तों की अमरबेल को हरा-भरा रखने का अच्छा हल खोज रखा है। मुझे तो लगता है बाकी परिवारों को भी ऐसे ही कुछ मध्य मार्ग तलाशने चाहिएं। छोटे खर्च की बात हो तो परफ्यूम, किताब, पौधे, मूर्ति और बड़े खर्च की नौबत आए तो रिश्तेदार को फोन करके अपना बजट बता देते हैं और बड़ी विनम्रता से पूछ भी लेते हैं-आप चाहें तो यह राशि नकद दे दें जो आपके खर्चों में सहायक हो सकती है या इतनी ही राशि के आसपास की कोई ऐसी वस्तु ला दें जो अन्य कोई रिश्तेदार न दे रहे हों। कई बार तो ऐसा भी हुआ जब तीन-चार रिश्तेदारों के बीच समझ बैठा कर उन्होंने भारी भरकम उपहार भेंट कर संबंधित रिश्तेदार का तनाव भी कम कर दिया।
कहने को तो यह बात उपहारों के आदान-प्रदान में सर्वसम्मत रास्ता निकालने की है, लेकिन जिंदगी के अन्य क्षेत्रों में भी यदि इतना ही खुलापन आ जाए तो तनाव के साथ ठिठकने वाली रात के बाद का सूयोüदय तो राहत की रोशनी लेकर ही आएगा। हमारे साथ परेशानी यह है कि अकसर हम उपहारों के चक्कर में भावनाओं का तौल-मौल करने लग जाते हैं। जब हम किसी के लिए उपहार लेकर जाते हैं तो मन ही मन उधेड़बुन चलती रहती है कि सामने वाला हमारी भावनाओं को बेहतर समझ ले। पर क्या हम खुद अपनों की भावनाओं को समझ पाते हैं। हमें तो अपना दुःख पहाड़ और सुख राई के दाने सा लगता है। पराई थाली में अधिक घी नजर आने की ऐसी आदत पड़ी हुई है कि अच्छे मन से किए काम की भी मन से सराहना करने में इसलिए हिचकिचाते हैं कि हम उसमें कारण तलाशते रहते हैं। हमारा मन तो जैसा है, ठीक है हमारी नजर भी इतनी घाघ हो गई है कि रैपर उतारने से पहले ही उपहार का एक्सरे तो कर लेती हैं लेकिन भावनाओं की झंकार नहीं समझ पातीं। लिहाजा कई बार ये उपहार भी रिश्तों में तनातनी और तकरार का कारण बन जाते हैं।
अगले हपते फैरूं, खम्मा घणी-सा...

Wednesday, 14 October 2009

किसी चेहरे पर आप भी ला सकते हैं खुशियों की चमक

गोल बाजार में हम जिस दुकान से सजावट का सामान ले रहे थे, उससे कुछ आगे पटाखे की एक दुकान पर खरीदारी कर रहे सज्जन ने स्कूटर पर बैठे अपने पुत्र को फुलझड़ी का पैकेट यह कहते हुए थमाया कि देखो ये बड़ी वाली अच्छी है, तुम्हारा हाथ भी नहीं जलेगा। उसी दौरान स्कूटर के समीप हाथ फैलाए एक छोटा बच्चा कुछ भीख मिलने की हसरत में बार-बार उन सज्जन को छूकर कुछ देने का इशारा करने लगा। झुंझलाते हुए उन्होंने उसे झिड़क दिया। पटाखों को हसरत भरी निगाहों से देखता वह बच्चा आगे बढ़ा ही था कि स्कूटर पर बैठे बच्चे ने फुलझड़ी का पैकेट उसके हाथ पर रख दिया।
अपने बच्चे की इस हरकत पर एक पल के लिए तो उन सज्जन के चेहरे पर शिकन नजर आई, उनके हाथ फुलझड़ी का पैकेट छीनने के लिए उठे भी लेकिन दूसरे ही पल उन्होंने उठे हुए हाथों में अपने बेटे का चेहरा लिया और झुककर उसका माथा चूम लिया। पापा के इस प्रेम से उस मासूम की खिलखिलाहट के साथ दोनों की आंखों की चमक बढ़ गई।
कुछ पल में इतना कुछ घटित हो गया। उन दोनों (पिता-पुत्र) के इस प्रसंग को कुछ और लोग भी देख रहे थे, उन सबकी मुस्कान ने खुशी के इस छोटे से प्रसंग को अनमोल बना दिया।
फुलझड़ी का एक पैकेट कोल्ड ड्रिंक की एक बोतल से भी कम कीमत का था लेकिन जिस बच्चे को अप्रत्याशित रूप से यह मनचाहा उपहार मिला उसके चेहरे की खुशी ऐसी थी मानो पटाखे की पूरी दुकान मिल गई हो। वरना तो जले-अधजले पटाखों के कचरे में से बिना जले पटाखे ढूंढकर भी ये बच्चे दिवाली मनाते ही हैं।
रोते हुए बच्चे को चुप कराने के लिए कई बार महंगे खिलौने थाली पर चम्मच की थाप के सामने बौने साबित हो जाते हैं। कौन सी पहल, कौनसा पल, कब-किसके चेहरे पर मुस्कान ले आए यह अंदाज नहीं लगाया जा सकता, लेकिन क्या हम खुशी की छोटी सी कंकरी भी फेंकने का प्रयास करते हैं, जिंदगी को बोझ मान चुके अंजान लोगों के चेहरों पर खुशी की लहर के लिए।
जिंदगी के उल्लास को रोशनी की जगमग में और बढ़ा-चढ़ाकर पेश करने वाले त्योहारों में दीपावली के मुकाबले कोई और त्योहार नहीं हो सकता। मुझे तो यह त्योहार लक्ष्मी के बहुरूपों में कांपिटिशन का त्योहार लगता है। जिसकी जेब भरी है वह और ज्यादा खर्च करने की उधेड़बुन में लगा रहता है और जिनके घर इस त्योहार पर भी बदरंग रहते हैं, वे सड़क से सातवें आसमान तक बिखरी रंगीनियों को देखते हुए दीपावली को शुभ बना लेते हैं। यह पर्व हमें अपनी हैसियत का आईना भी दिखाता है। ऐसे में भी वह मासूम बच्चा बिना किसी अपेक्षा के फुलझड़ी का पैकेट उस अधनंगे बच्चे के हाथों में रखकर खुश हो जाता है।
हमारे आसपास भी ऐसे बच्चों, परिवारों या आश्रमों में दया पर जिंदगी काट रहे लोगों की कमी नहीं है जिनके लिए दिवाली का मतलब उदासी ही है। मदर टेरेसा और महाभारत के कर्ण जैसे हम हो नहीं सकते लेकिन किसी एक चेहरे पर खुशी की लहर से हमें यह तो पता चल ही जाता है कि अनमोल खुशी पाने के लिए बहुत ज्यादा खर्च भी जरूरी नहीं है। दिन में चाय, सिगरेट, पाउच पर या पीने-पिलाने में एक दिन में कितना खर्च हो जाता है, हिसाब कहां रख पाते हैं लेकिन ईश्वर की कृपा, खुद के पुरुषार्थ से हम सक्षम हैं। हर दिन पांच रुपए भी बचाएं तो एक महीने या एक साल में अच्छी खासी रकम जमा हो सकती है। कौन पात्र है, कौन अपात्र, कौन आश्रम और दान की रकम का दुरुपयोग कर रहे हैं, दान के लिए सुपात्र कौन? ऐसी अनेक जिज्ञासाओं का जवाब फुलझड़ी का पैकेट भेंट करने वाले प्रसंग से मिल सकता है।
दीपावली से हजार गुना अच्छा त्योहार मुझे रंगों का पर्व लगता है। इन दोनों ही त्योहारों में खुशियों के रंग बिखरते हैं लेकिन एक में जितना खर्च उतनी खुशी तो दूसरे में बिना खर्च के भी खुशी ही खुशी। दिवाली में आईना हमारी हैसियत दिखा देता है और होली में हैसियत वाला भी फटे-पुराने कपड़ों में शान से घूमता है। बिना जेब वाले कपड़े होली पर ही अच्छे लगते हैं। रंग गुलाल रखने की हैसियत भी नहीं हो तो मुन्नाभाई की झप्पी से ही रंगों के इंद्रधनुष बिखर जाते हैं। अध्यात्म के नजरिए से देखें तो दीपावली हमें माया-मोह-बाहरी प्रदर्शन के बंधनों में जकड़ी खुशी का अहसास कराती है। दूसरी तरफ होली है जो हमें सिखाती है निर्भर होना। जो है उसे भी छोड़ो, त्याग और अंदर की खुशी पाने के लिए माया से दूर रहो, कैसे आए और कैसे संसार से जाना है? आत्मिक आनंद का यह रहस्य होली समझाती है।
इस दीपावली के स्वागत में खूब खर्च करें। लक्ष्मी हम सब के घर में आसन जमा कर बैठ जाए, ऐसे प्रयास करने में भी कोई हर्ज नहीं। बस, मिठाई खाते और रॉकेट छोड़ते वक्त एक नजर पासपड़ोस के घरों पर भी डाल लें। देखें तो सही वहां भी नन्हा सा दीपक टिमटिमा रहा है या नहीं। बुझते दीपक की रोशनी बढ़ाने के लिए भी तो हम तेल-घी डालने में देरी नहीं करते। किसी एक चेहरे पर आपकी उदारता से आई मुस्कान से मन को जो सुकून मिलेगा, वह दीपावली के भारी-भरकम गिफ्ट पर भारी पड़ेगा।
अगले हपते फैरूं, खम्मा घणी-सा...

Wednesday, 7 October 2009

श्रेय को भी बांटना सीखें

अभी भारत विकास परिषद के आयोजन राष्ट्रीय समूहगान स्पर्द्धा को देखने-सुनने-समझने का अवसर मिला। यूं देखा जाए तो इसमें श्रीगंगानगर, सूरतगढ़, हनुमानगढ़, बीकानेर आदि स्थानों पर हुई स्पर्द्धा में कुछ स्कूलों के दलों की भागीदारी थी। स्पर्द्धा में किसी एक दल का ही चयन प्रथम स्थान के लिए होना था। जो सीखने और जीवन के संदर्भ में समझने की बात है, वह यह कि किसी भी क्षेत्र में नंबर वन पर आने के लिए प्रयास तो सभी करते हैं लेकिन पहुंचता वही है जिसके प्रयास ज्यादा कारगर होते हैं। बाकी तो नंबर दो-तीन-चार रह जाते हैं। स्पर्द्धाओं का यह कड़वा सच है कि प्रथम रहे खिलाड़ी या टीम का नाम ही याद रहता है। इतिहास में भी तो ऐसा ही कुछ होता है। या तो हमें अकबर महान याद है अथवा कट्टर छवि वाला औरंगजेब। बाकी सम्राट-नवाब इतिहास के किस कोने में हैं याद नहीं।

नंबर वन तक पहुंचने के लिए सभी स्कूलों की टीम ने प्रस्तुति में कोई कसर नहीं छोड़ी लेकिन प्रथम वाले मापदंड तक कोई एक टीम ही पहुंची। मुझे लगता है एक जैसे सामूहिक प्रयासों से यदि मनचाही सफलता प्राप्त की जा सकती है तो किसी एक कमजोर कड़ी के कारण शिखर तक पहुंचने से पहले पैर फिसल भी सकता है। कहीं बच्चों ने अच्छा गाया तो संगीत कमजोर था, कुछ बच्चों ने बिना म्यूजिक टीचर के ही तैयारी की, कहीं ड्रेसकोड आकर्षक नहीं था तो किसी दल के छात्रों के चेहरे पर गीतों के बोल वाला उत्साह नहीं था, किसी दल में गीत तैयार कराने वाले प्रशिक्षक की मेहनत कम नजर आई तो किसी दल के छात्र बस इसी भाव से मंच पर आए कि गीत प्रस्तुत करना है, कहीं छात्रों में उत्साह था लेकिन टीचर-प्रशिक्षक थके-थके से थे। ये सारी कमियां जहां न्यूनतम थीं, वही दल दर्शकों की नजर में नंबर वन बन गया था, निर्णयको ने बाद में जब निर्णय सुनाया तो दर्शकों के फैसले की पुष्टि भी हो गई। क्षेत्र चाहे गीत-संगीत का हो, खेल का मैदान हो या प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी की बात हो। किसी भी क्षेत्र में लक्ष्य प्राप्त के लिए यदि शत-प्रतिशत समर्पण नहीं है तो सफलता भी आधी अधूरी ही मिलेगी। किसी टीम को सफलता तभी मिलती है जब उसका प्रत्येक सदस्य अपना काम पूरे समर्पण से करे। लंका फतह करना इसीलिए आसान हो गया था कि हनुमान सहित सभी वानरों ने अपना काम समर्पण-भक्ति-आस्था से किया और समुद्र पर पुल बना डाला।
धर्मग्रंथों के ऐसे प्रसंग हमें सिखाते तो बहुत कुछ हैं लेकिन हमारा स्वभाव ऐसा है कि अपने आगे किसी अन्य का सहयोग श्रेष्ठ नजर ही नहीं आता। अच्छा हुआ तो मेरे कारण, काम बिगड़ा तो बाकी लोगों ने सहयोग नहीं किया, जिम्मेदारी नहीं समझी वगैरह....। ढेर सारे सदस्यों वाली टीम भी कई बार निर्धारित लक्ष्य तक इसलिए नहीं पहुंच पाती कि उसके सदस्यों में अपने ही साथियों की खामियां तलाशने का उत्साह अधिक रहता है।
बचपन में पढ़ी-सुनी यह कहानी हम सभी को याद है जो काम के नाम पर दिखावे और मन से किए प्रयास इन दोनों स्थितियों का सामना करने के बाद मिली सफलता को दर्शाती है। नदी किनारे के एक पेड़ पर चिçड़या का घोंसला था, चिçड़या के नवजात चूजे घोंसले में चीं-चीं करते उछलकूद कर रहे थे कि अचानक एक चूजा नदी में गिर गया। बहाव हल्का था लेकिन चिडिया को सूझ नहीं रहा था कि मुसीबत से कैसे निपटे। चिडिया ने अपने पड़ोसी बंदर भैया से सहयोग मांगा, उसने आश्वस्त किया मैं तुम्हारे चूजे को बचाने का प्रयास करता हूं। बंदर एक से दूसरे-तीसरे पेड़ पर छलांग लगाने लगा, नीचे वह नन्हा चूजा चिडिया की नजरों से दूर होता जा रहा था। उसने अनुरोध किया- बंदर भैया कुछ करो। उसका जवाब था- चिडिया बहन, तुम देख तो रही हो कितने प्रयास कर रहा हूं, आगे भगवान की मर्जी।
अब तक चिडिया मुसीबत का सामना करने का मन बना चुकी थी। ठंडे दिमाग से कुछ सोचा और पेड़ की सूखी-पतली टहनियां चोंच में दबाकर नदी में चूजे के आसपास डालने लगी। थोड़ी ही देर के इस सार्थक प्रयास का नतीजा यह हुआ कि चूजे के लिए वे तिनके डूबते का सहारा बन गए। जैसे-तैसे वह नन्हा उन तिनकों के सहारे किनारे की ओर आया। चिडिया ने उड़ान भरी और उसे पंजे में सहेज कर घोंसले में ले आई। इस कहानी का मुझे तो यही संदेश समझ आया है कि ईमानदारी से प्रयास किए जाएं तो देरी से ही सही सफलता मिलती जरूर है। सवाल ये उठता है कि हम ईमानदारी से प्रयास करते भी हैं या नहीं, हम तो नंबर वन पर रहने वालों से सीखने के बजाय सारा वक्त इसी उधेड़बुन में लगा देते हैं कि उसे यह सफलता किसकी सिफारिश से मिली।
अगले हपते फैरूं, खम्मा घणी-सा...