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Wednesday, 29 April 2009

पानी तो खूब है फिर हरियाली क्यों नहीं!

गर्मी के इन महीनों में शहर का सीना चीरकर गुजरते नेशनल हाइवे पर दूर-दूर तक पेड़ नजर नहीं आते टेंपों के इंतजार में खड़े लोगों को पहले पेड़ तलाशना पड़ता है। पेड़ मिल जाए तो पर्याप्त छांव नहीं मिलती क्योंकि पेड़ की उस छांव में समाजवाद पसरा होता है-स्ट्रीट डाग, बकरियां, अधलेटे भिखारी के बीच कोई वृद्ध टेंपों के इंतजार में पसीना पोंछता नजर आता है।ऐसा शहर बिरला ही होगा जहां पानी तो भरपूर है लेकिन उतनी हरियाली नहीं। आयोजन तो यहां खूब होते हैं पौधे लगाए ाी जाते हैं लेकिन वह पौधारोपण होता है भरपेट खाए व्यक्ति को भोजन पर आमंत्रित करने जैसा यानी बगीचों या जहां पहले से पौधे लगे हैं वही कुछ पौधे और लगा दिए जाते हैं। इसीलिए पूरा शहर तो हरा-भरा नजर नहीं आता, हरियाली के धब्बे जरूर दिखाई देते हैं।भीषण गर्मी के इन दिनों में पौधारोपण तो हो नहीं सकता लेकिन भ् जून को विश्व पर्यावरण दिवस से अभियान की प्लानिंग तो की ही जा सकती है। वन विभाग पर्याप्त पौधे जुटा ले, सामाजिक-व्यापारिक संगठन पौधारोपण करना भी चाहते हैं लेकिन बात आकर रुक जाती है महंगे ट्री गार्ड कैसे जुटाएं। वन विभाग, नगर परिषद, यूआईटी आदि को सक्रिय कर जिला प्रशासन सस्ते और बेहतर ट्री गार्ड बनवाने की पहल करे तो लागत मूल्य पर ट्री गार्ड दानदाताओं के माध्यम से प्रकृति प्रेमियों को उपलब्ध कराए जा सकते हैं। स्कूल-कॉलेजों को जोड़कर पूरे शहर और नेशनल हाइवे के दोनों तरफ पौधे लगाए जा सकते हैं। लोगों को अपने प्रियजनों की स्मृति में, शादी की सालगिरह, जन्मदिन आदि प्रसंगों पर भी पौधारोपण के लिए प्रेरित किया जा सकता है। हनुमानगढ़ में यदि नशे के खिलाफ अभियान चल सकता है तो यहां ग्रीन गंगानगर का अभियान क्यों नहीं चल सकता। ट्री गार्ड से भी ज्यादा जरूरी है इच्छाशक्ति की। जनभागीदारी के कायाZे को प्रेरित करने के लिए पहल तो जिला प्रशासन को ही करनी होगी।
संत सीचेवाला आए राह दिखाने
अज्ञान और असमंजस के अंधेरे को दूर करने के लिए ही संत पुरुषों का आगमन होता रहा है। पंजाब से आ रहे दूषित पानी से और किसी को इतनी चिंता नहीं हुई जितनी एक औंकार ट्रस्ट के संत बलवीरसिंह सीचेवाला को हुई। संतजी का यह कहना भी सही है कि पंजाब वाले क्यों चिंता करेंगे बीकानेर संभाग के इन जिलों की। बात भी सही है जिसका पेट दुख रहा है दवाई उसे ही मांगनी चाहिए। ऐसा हुआ नहीं इसलिए संत जी को आना पड़ा। जागना तो चुनाव लड़ रहे भावी सांसद को भी था, बाकी नेताओं को ाी जागना था, पानी की लड़ाई का झंडा थामने वाले माकपा विधायक बीकानेर में चुनावी संघर्ष में व्यस्त हैं। इतिहास ने फिर अपने को दोहराया ही है कि जब राजनीति और राजनेता को कुछ नहीं सूझता तब संत ही रास्ता दिखाते हैैं संत सीचेवाला ने यही तो किया है।
दुआ तो मिलेगी ही
अब तक पुलिस को बद्दुआ देने वाले सैकड़ों परिवारों की हनुमानगढ़ कलेक्टर को तो दुआ ही मिल रही होगी। वैसे तो दोनों जिलों में नशे का कारोबार धड़ल्ले से हो रहा है। पुलिस विभाग खानापूर्ति के लिए कार्रवाई भी करता रहता है लेकिन जिस तरह संगरिया में नशीली गोलियों के कारोबार का जिला प्रशासन ने पदाüफाश किया है इससे पुलिस एवं औषधि प्रशासन विभाग की çढलाई से भी पदाü उठा है। इस नशीले कारोबार में अब तक जिन लोगों के नाम सामने आए हैं वो कोई सामान्य परिवार से नहीं है और यही कारण इन दोनों विभागों की उदासीनता को भी मजबूत करने वाला हो सकता है। अच्छा तो यही होगा कि नशे की लत में फंसे जिले के युवाओं के परिवारों को राहत देने के लिए कलेक्टर नशा मुक्ति शिविरों की अध्यक्षता की अपेक्षा यह अभियान सतत चलाते रहे।
दमकलों का इंतजाम तो हो
गर्मी वाले इन महीनों में दोनों जिलों में अçग्नकांड की घटनाएं भी बढ़ जाती हैं। जिला प्रशासन को चाक-चौबंद होना ही चाहिए। इसके साथ ही उपखंड मुयालय वाले टिब्बी, रावतसर जैसे कस्बों के बारे में भी सोचना चाहिए जहां अनाज मंडियां भी हैं। यहां से अच्छा राजस्व भी प्राप्त होता है लेकिन फायर ब्रिगेड दस्ता नहीं हैं। होना तो यह चाहिए कि लोग घेराव आगजनी पर उतरे उससे पहले ही दमकलों की व्यवस्था हो जाए।
बात समझ आई या नहीं
दोनों जिलों में बारदाना जिला प्रशासन के लिए करंट इशु बना हुआ है। अनाज मंडी, गेहूं खरीदी जैसे मसलों से जिला प्रशासन का सीधा ताल्लुक तो नहीं है लेकिन गेहूं खरीदी में अग्रणी एफसीआई की उदासीनता का ही नतीजा है कि किसानों-व्यापारियों के असंतोष का सामना प्रशासन को करना पड़ रहा है। गेहूं खरीदी प्रारंभ होगी तो बारदाना भी थोक में लगेगा। इस बात में न समझने जैसी तो कोई बात है नहीं, फिर क्या एफसीआई में नासमझ स्टाफ की अधिकता हो गई हैै।
अगले हपते फैरूं, खमा घणी-सा...

Saturday, 25 April 2009

नमस्कार का जवाब देने में बुराई तो नहीं

आप इतना रूखा बोलते होंगे, आपके आटिüकल्स से ऐसा तो नहीं लगता। भास्कर के हनुमानगढ़ निवासी एक प्रबुद्ध पाठक (98284-4422888) के इस एसएमएस ने मुझे मेरे व्यवहार में सुधार के लिए आइना दिखाने जैसा काम किया है। इस सारे मामले के जिक्र से पहले बाकी पाठकों के लिए भी सीखने की बात यह है कि आप अंजाने में भी ऐसा व्यवहार न करें, जिससे सामने वाले के मन में आपकी गलत छवि बन जाए। यदि ऐसा हो रहा हो तो अच्छाई इसी में है कि आप गलतफहमी तत्काल दूर कर दें और क्षमा मांगकर खुद की भूल को सुधारने का प्रयास भी करें।हुआ यूं कि हमारे उक्त प्रबुद्ध पाठक का एक समाचार के संदर्भ में मुझे फोन आया जबकि वे (Žयूरो कार्यालय हनुमानगढ़ में) पदस्थ स्टाफ के सदस्यों को भी जानते थे। मैंने उनकी बात सुनी, स्टाफ के एक वरिष्ठ सदस्य को कवरेज करा लेने के निर्देश देकर फोन बंद किया ही था कि उक्त एसएमएस प्राप्त हुआ। आसान तरीका तो यही था कि मैं एसएमएस की अनदेखी कर अपने बाकी काम निपटाता लेकिन जो भी लोग सार्वजनिक जीवन में हैं वे यदि ऐसा करने लग जाएं तो लंबा नहीं चल सकते। मैंने उन्हें फोन किया और सबसे पहले माफी मांगी कि मेरे व्यवहार से उनका मन दुखा। उदारमना पाठक ने मुझे माफ कर दिया, फोन करने पर आभार भी जताया। मैंने उनसे आग्रह किया कि मुझे यह बताएं कि मेरे व्यवहार में ऐसा क्या था जिससे उनका मन दुखा। मेरे बार-बार के आग्रह पर उन्होंने कहा कि `मैंने फोन पर बात शुरू करने से पहले तीन बार नमस्कार किया लेकिन आप यही दोहराते रहे काम की बात बताइए।ं फिर उनसे मैंने पूछा आपका काम हुआ या नहीं। उन्होंने कहा जी कुछ देर बाद ही आपके रिपोर्टर कवरेज के लिए आ गए थे। पूरी चर्चा से वे संतुष्ट नजर आए और उन्होंने कहा भी कि मुझे अच्छा नहीं लगा था, इसलिए एसएमएस कर दिया लेकिन अब माफ भी कर दिया है।यदि मैं उन प्रबुद्ध पाठक को फोन नहीं करता तो उनका तो यह परसेप्शन (धारणा) बन ही गया था कि आप इतना रूखा बोलते हैं। अखबार के एक भी पाठक का ऐसा परसेप्शन किसी एक व्यçक्त के बार में बनने का मतलब है पूरे स्टाफ को एक तराजू में तौलना और अखबार यानी एक ब्रांड के बारे में गलत छवि बनना। यह ऐसा ही है कि सफेदझक कपड़ों की अपेक्षा लोगों की नजर किसी कोने पर लगे छोटे से काले धŽबे पर ही जाए। हमारी संस्कृति और संस्कार इतने संवेदनशील हैं कि घर आए व्यçक्त से चाहे जितने प्रेम से बात कर लें। चाय-भोजन न कराएं लेकिन पानी के लिए नहीं पूछा तो सुनने को मिल सकता है उनके घर गए थे, पानी तक के लिए नहीं पूछा। मतलब यह कि आप सार्वजनिक जीवन में हों, किराना दुकान चलाते हों, ऑफिस में बॉस हो, आपको अपनों से काम लेना है या अपना प्रोडक्ट बेचना है तो डांट-फटकार से या दूसरे के प्रोडक्ट की खामियां गिनाकर आप अपना माल लंबे समय तक नहीं बेच सकते। इसके लिए तो यही जरूरी है कि आप अपने व्यवहार में सुधार की तरह अपने प्रोडक्ट में भी निरंतर सुधार करते रहें। जब अपनी गोद में अपरिचित बच्चे को लेने के लिए तुतलाती जबान में मुस्कुराते, ताली बजाते उस बच्चे का विश्वास जीतना चाहते हैं तो अपने परिचितों, सहकर्मियों, ग्राहकों से रूखा व्यवहार करके उनका दिल क्यों दुखाते हैं?
बार संघ का दिल दुखा दिया
बात दिल दुखाने की ही चली है तो बार एसोसिएशन श्रीगंगानगर की आपात बैठक कोरम के अभाव में हो ही नहीं पाई। लिहाजा जिला-सत्र न्यायाधीश उमेशचंद्र शर्मा के खिलाफ मोर्चा खोलने का मन बनाने वालों का दिल भी दुखा होगा। बैठक में पर्याप्त उपस्थिति न होना यह भी संकेत हो सकता है कि बाकी सदस्य बात आगे बढ़ाने के मूड में नहीं हैं। बार संघ के पदाधिकारियों का भी दिल दुखा तो इसलिए कि डीजे ने लीक से हटकर मीडिया तक बात कही और सभी अदालतों में नोटिस बोर्ड पर भी अपना कथन चस्पा करा दिया। उच्च न्यायालय, सवोüच्च न्यायालय में भी बार संघ कार्यरत हैं, वहां की कई अच्छी बातें देर-सवेर जिला बार संघों तक भी पहुंचेंगी ही। तब संभव है अधिवक्ताओं के दिल नहीं दुखें।
दुकानदारों के दिल से भी पूछे कोई
दिल तो हनुमानगढ़ टाउन के स्टेशन रोड, शनिदेव मंदिर वाली गली, दुगाü कॉलोनी क्षेत्र के दुकानदारों का भी दुखा होगा, जब अवैध निर्माण तोड़ने वाला दस्ता पहुंचा था। अब अपने हाथों वह सारा निर्माण तोड़ते हुए भी इनका दिल दुख रहा है लेकिन जब सड़क का हिस्सा आजाद होगा तो फायदा किसी और क्षेत्र को नहीं, इन्हीं सभी दुकानदारों को ही मिलेगा। अच्छा हो कि इन आंसू बहाते दुकानदारों से बाकी क्षेत्र के लोगा भी सबक लें। चुनाव की व्यवस्तता से मुक्त होने के बाद दोनों जिलों के अधिकारियों को व्यस्त मागोZ, चौराहों को अतिक्रमण मुक्त कराने के लिए संबंधित क्षेत्र के व्यापारिक संगठनों को बुलाकर बात करनी ही चाहिए।
बैंकों में खाता खुल जाए तो
पढ़ने के मामले मेें जागरूकता की कमी एक न एक दिन दूर होगी ही लेकिन पढ़ाने वालों में भी या तो जागरूकता की कमी है या फिर उनकी हालत भी दांतों के बीच जुबान जैसी ही है। बीएड कॉलेज में पढ़ाने वाले हों या निजी स्कूल का स्टाफ, ऐसे सारे शैक्षणिक संस्थानों को संचालित करने वाले अपने स्टाफ को रखते तो ऊंची तनवाह पर हैं लेकिन देते हैं कम वेतन। पूरा परिवार जब किसी एक की तनवाह पर निर्भर हो तब समाज सुधार का ज्वालामुखी भी मजबूरी की मिट्टी से ठंडा हो जाता है। दोनों जिलों में चल रहे बीएड कॉलेजों सहित अन्य शिक्षण संस्थानों में ज्यादातर जगह कम तनवाह पर पढ़ाने वालों का बस एक ही सपना है कि उन्हें बैंक से तनवाह मिलने लग जाए। ऐसा होगा तो सारा झूठ, सच में बदल जाएगा। पर ऐसा भी तभी होगा जब कलेक्टरों को कुछ भले कार्य करने की इच्छा होगी।
अगले हपते फैरूं, खमा घणी-सा...

Thursday, 16 April 2009

याद आ गई बचपन में पढ़ी कहानी की

बचपन में प्रारंभिक पढ़ाई के दौरान मुंशी प्रेमचंद की कहानी पंच परमेश्वर (दो मुय पात्र अलगू चौधरी और जुमन शेख) अब तक याद है। जिला सत्र न्यायालय ने वर्क सस्पेंड के मामले में मीडिया तक अपनी बात पहुंचाकर एक बार फिर इस कहानी की याद दिला दी। जब कहानी का नायक पंच की कुर्सी पर बैठता है तो फैसला अपने अतिप्रिय दोस्त के खिलाफ सुनाने में भी नहीं हिचकता। अब तक की मेरी पत्रकारिता में यह यादगार अनुभव ही है कि अपनी बात कहने के लिए जिला सेशन न्यायालय मीडिया तक जाए। अमूमन प्रेस और न्याय जगत के बीच एक अघोषित लक्ष्मण रेखा है। बार संघ आदि तो फिर भी मीडिया तक अपनी बात पहुंचाते हैं लेकिन न्यायिक सेवा के छोटे से लेकर बड़े पदों का दायित्व संभालने वाले अधिकारी प्रेस से, सार्वजनिक समारोह से दूरी ही बनाकर रखते हैं। जाहिर है इसका भी एक मात्र उद्देश्य होता है न्याय जगत की गरिमा और पवित्रता बनाए रखना। राजस्थान में संभवतज् यह पहली ऐसी मिसाल है जो न्याय जगत में बेमिसाल ही कही जाएगी कि जिला एवं सेशन न्यायालय ने बार एसोसिएशन के वर्क सस्पेंड से चार दिनी गतिरोध और कथित सुलह को लेकर उपजे भ्रम को दूर करने के लिए खुद ही पहल की और मीडिया के माध्यम से आम जन एवं पक्षकारों को वस्तुस्थिति भी बताई। ऐसा नहीं कि वर्क सस्पेंड को लेकर गतिरोध प्रारंभ होने पर `भास्करं ने जिला-सत्र न्यायाधीश उमेशदत शर्मा से उनके विचार जानने के प्रयास नहीं किए। न्याय जगत की तरह दैनिक भास्कर की भी यह पॉलिसी है कि प्राकृतिक न्याय के तहत सभी पक्षों को अपनी बात कहने का अवसर मिलना ही चाहिए । चूंकि न्यायिक सेवा से जुड़ा वर्ग मीडिया में नहीं जा सकता इसलिए खुद `ाास्करं गया था जिला सत्र न्यायाधीश से उनके विचार जानने। मर्यादाओं का पालन करते हुए उन्होंने नो कमेंट्स कह कर चुप्पी साध ली थी। नतीजा यह कि वर्क सस्पेंड और सुलह का जैसा मजमून बार संघ ने बताया वैसा ही छपा भी। मीडिया को यह भी जानकारी थी कि वकीलों और न्यायालय के बीच वैचारिक भ्रम की स्थिति बन भी जाए तो प्रशासनिक अधिकारी न तो मध्यस्थ की भूमिका निभा सकते हैं और न ही ऐसे कोई अधिकार उन्हें प्राप्त हैं। न्यायालय ठान ले तो यह बहुत आसान है कि वह अवमानना के मामले में तो मीडिया को कटघरे में खड़ा कर ही सकता है लेकिन वह न्याय मंदिर ही क्या जो मुंशी प्रेमचंद के पंच परमेश्वर का प्रतिनिधित्व न करें। जिला सत्र न्यायालय ने मीडिया के जरिए अपनी बात कह कर आमजन तक सही तथ्यों की जानकारी पहुंचाई। यह अलग मुद्दा है कि जिला सत्र न्यायालय के इस कदम को बाकी मीडिया ने कितना समझा, कैसा सराहा। न्यायालय में सामान्य कामकाज शुरू जरूर हो गया है लेकिन भविष्य में वर्क सस्पेंड की स्थिति नहीं बनेगी यह दावा तो बार एसोसिएशन के पदाधिकारी भी नहीं कर सकते। संघ के वर्तमान-पूर्व सदस्यों के प्रति अपनी भावना का इजहार करने, किसी ज्वलंत मुद्दे पर अपनी जागरूकता दिखाने के लिए संघ का यह अचूक हथियार भी है जाहिर है इसका उपयोग इस तरह से हो कि अन्य किसी को परेशानी भी न हो। संघ के लिए तो वर्क सस्पेंड लक्ष्यभेदी मिसाइल के समान है। मध्यमार्ग यही हो सकता है कि दोपहर तक पक्षकारों के काम निपटाए जाएं और वर्क सस्पेंड उसके बाद किया जाए। जब मंजिल तक पहुंचने का रास्ता न सूझे या दिशा भ्रम की स्थिति बन जाए तो समय बचाने के लिए किसी से रास्ता पूछ लेने में ही समझदारी होती है। अच्छा हो कि सदस्यों की नाराजगी से बचने के लिए संघ के पदाधिकारी गुप्त मतदान या बहस करा लें और जो आम राय बने वह फैसला मान्य कर लें। क्योंकि बार संघ भी नहीं चाहेगा कि जिला सत्र न्यायालय को फिर मीडिया के बीच जाना पड़े।
उन सब पर भी कार्रवाई हो
पीलीबंगा में चले अतिक्रमण विरोधी अभियान से भी कोई सबक न लेना चाहे तो इसमें अदालत का क्या दोष। हनुमानगढ़ में अब जो सड़क चौड़ा कराने का अभियान चलने वाला है वह भी अदालत के आदेशों की अनदेखी का ही नतीजा है। सड़कों को म्-म् फुट घेर कर पत निर्माण करने वालों के हौंसले यदि इतने बढ़ गए तो जाहिर है कि जिला प्रशासन, नगर परिषद ने भी आंखें मंूद रखी थी। जितने दोष्ाी अतिक्रमणकर्ता हैं उससे प्रशासनिक अधिकारी कहीं अधिक दोषी हैं जिन्होंने राजनीतिक दबाव-प्रभाव और अपने स्वार्थ के कारण लगातार कोर्ट की अवमानना होने दी। अभियान चले, सड़कें चौड़ी हों लेकिन उन लोगों को भी नहीं बशा जाए जो इन इलाकों में पदस्थ थे और लगातार पक्के अवैध निर्माणों की अनदेखी करते रहे।
बहाव में हो जाती मरमत
गलती पंजाब की हो या लापरवाही सिंचाई विभाग की बात निकली है तो दूर तलक जाएगी ही! फरमान जारी हो गया कि क्त्त् अप्रैल तक नहरबंदी कर दी है, इस दौरान नहरों की साफ सफाई, मरमत के लिए हमेशा की तरह पर्याप्त बजट भी जारी हो गया। नहरों की सफाई, मरमत कैसे होती क्योंकि क्क् अप्रैल तक तो पंजाब से नहरों में पानी आता रहा। असलियत ऊपर तक पहुंची तो अब लीपापोती चल रही है वरना तो नहरों में बहाव जारी रहता और मरमत का बजट भी काम में आ जाता। अब आइजीएनपी कार्यालय में रिपोर्ट तैयार की जा रही है कि बहाव के चलते भी किस कौशल से कहां-कहां मरमत कार्य करा लिया!
गçर्दश में हों तारे...
भादरा इलाके में तो पुलिस के सितारे गçर्दश में ही चल रहे हैं। भिरानी थाना के लॉकअप में आत्महत्या कर भानगढ़ निवासी पवन कुलरिया ने पूरे थाने को परेशानी में डाल रखा है। दूसरी तरफ एड़ी चोटी का जोर लगाने के बाद भी भादरा थाना क्षेत्र में हुई छात्रा कृष्णा जोगी की हत्या के आरोपियों को पुलिस आज तक नहीं खोज पाई है। थाना स्टाफ फिर भी चिंतामुक्त है तो इसलिए कि अब इस कांड की जांच बड़े-बड़े अधिकारी कर रहे हैं, उनका ही जब कुछ नहीं हुआ तो इनका बाल बांका कौन कर सकता है।
अगले हपते फैरूं, खमा घणी-सा...