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Thursday, 29 July 2010

नजर रखिए अवसर पर

ईश्वर ने हमें नजर तो दी है लेकिन अवसर हमें नजर नहीं आते। अवसर हमारे दरवाजे तक आ भी जाएं तो हम उन्हेें लपकना भी नहीं जानते। काम नहीं मिलने पर हम घंटों बेसिरपैर की बातें कर सकते हैं लेकिन अपनी कमजोरियों को दूर करने या उन्हें अपनी ताकत में बदलने का वक्त हमारे पास नहीं है। बिना योज्यता वालों के लिए भी सम्मानजनक काम के अवसरों की कमी नहीं है लेकिन यहां भी हमारा आत्मसम्मान आड़े आ जाता है। दुकानों के बाहर लगी नौकर चाहिए की तख्तियां बताती हैं कि लोगों को छोटे काम करने की अपेक्षा बेकार घूमना ज्यादा अच्छा लगता है।
सफर के दौरान जैसे ही कोई बड़ा स्टेशन आता ट्रेन में भीख मांगने वालों का सिलसिला शुरू हो जाता। इन्हीं लोगों के बीच एक दृष्टिबाधित युवक ने कई यात्रियों का ध्यान आकॢषत किया। वह पेपर सोप बेच रहा था। टायलेट जाने वाले यात्रियों ने उससे पेपर सोप खरीदने के साथ ही उसके इस कार्य की सराहना भी की। उसके लिए बहुत आसान था अपनी इस कमजोरी को भावनात्मक रूप से लोगों से सहायता का माध्यम बनाना। वह अन्य भिखारियों की तरह यात्रियों के सामने हाथ भी फैला सकता था लेकिन उसने रास्ता चुना आत्म सम्मान वाला। इस अवसर ने उसे बाकी भिखारियों से अलग कर दिया। उसने जो रास्ता चुना उसमें ना योग्यता जैसी चुनौती आड़े आई न ही किसी की सिफारिश की जरूरत पड़ी।
मुझे लगता है हममें से ज्यादातर लोग अपनी कमजोरी को इस तरह पेश करते हैं कि लोग हम पर दया करें और हमें लाभ मिल जाए। कहा भी तो है मुसीबत, मेहमान और मौत अचानक ही आते हैं। यह पता होने के बाद भी हम असफलता के ज्यादातर मामलों में लगभग ऐसे ही कारणों का सहारा लेते हैं। जिसे हम अपनी बात समझाने का प्रयास करते हैं न सिर्फ उसे वरन खुद हमें भी पता होता है कि इस तरह की बहानेबाजी मेें कोई दम नहीं है। फिर भी हम अपनी असफलता को छुपाने का प्रयास तो करते ही हैं।
एक बड़े ग्रुप के एमडी अपने साथियों से चर्चा में अकसर कहा करते हैं कि शांत समुद्र में तो अनाड़ी नाविक भी आराम से नाव चला सकता है। कुशल नाविक तो वह होता है जो आंधी-तूफान में लहरों के उतार-चढ़ाव का सामना करते हुए बिना घबराए किनारे तक नाव लेकर आता है। जयपुर या चंडीगढ़ की सड़कों पर फर्राटे से गाड़ी दौड़ाने वाले कई ड्राइवर बद्रीनाथ-केदारनाथ के मार्गों पर उतनी निर्भीकता से शायद ही गाड़ी चला पाएं क्योंकि उन सर्पीले और संकरे रास्तों पर उन्हें गाड़ी चलाने का पूर्व अनुभव नहीं होता, इसीलिए ज्यादातर श्रद्धालु हरिद्वार या ऋषिकेश इन्हीं उन क्षेत्रों के अनुभवी ड्राइवरों की सेवा लेना पसंद करते हैं।
हम अपनी कमजोरियों को समझते तो हैं लेकिन उन्हेेंं दूर करने के बारे में नहीं सोचते और न ही उस कमजोरी को अपनी ताकत बना पाते हैं। एक दृष्टिबाधित ट्रेन में पेपर सोप बेचकर अपनी कमजोरी को अपनी ताकत बना सकता है लेकिन हम अपने आसपास देखें तो ऐसे अनेक लोग मिल जाएंगे जो पढ़े लिखे तो हैं लेकिन बेरोजगार हैं। शिमला में माल रोड की दुकानें हों या लक्कड़ बाजार, लोअर बाजार शिमला की दुकानें यहां ड्राइवर चाहिए, सेल्समेन चाहिए, होटल में काम करने के लिए नौकर चाहिए की सूचना दुकानों के बाहर महीनों तक लगी देखी जा सकती है। इससे यह तो माना ही जा सकता है कि या तो बेरोजगारों में इन कार्यों जितनी योग्यता भी नहीं है या ऐसा कोई काम करने की अपेक्षा उन्हें बेकार रहना ज्यादा अच्छा लगता है। जिंदगी में अवसर हमेशा मिलते नहीं और जब अवसर नजर आएं तो झपटने में हर्ज भी नहीं। जो अवसर झपटना जानते हैं उनके लिए रास्ते खुद-ब-खुद बनते जाते हैं लेकिन जो कोई निर्णय नहीं ले पाते वो फिर हमेशा पश्चाताप ही करते रहते हैं कि क ाश उस वक्त थोड़ा साहस दिखाया होता। तब हमें लगता है कि कमजोरी वाले बहाने ही हमारी प्रगति में कई बार बाधा भी बन गए।
हम प्रयास करें नहीं और यह भी चाहें कि सफलता मिल जाए तो यह ना सतयुग में आसान था न अब। तब मनोकामना पूर्ण हो जाए इसलिए संतों से लेकर सम्राट तक तपस्या या युद्ध का रास्ता अपनाते थे और अब स्पर्धा के युग में टेलेंट में टक्कर होती है। सिफारिश से पद तो प्राप्त किया जा सकता है लेकिन उस पद के योग्य भी हैं या नहीं यह किए जाने वाले काम से ही सिद्ध हो सकता है। भूख लगने पर थाली में पकवान सजा कर तो कोई भी रख देगा लेकिन खाने के लिए तो हाथ हमें ही बढ़ाना होगा। बहानों की चादर ओढ़ कर आलसी बने रहेंगे तो दरवाजे तक आए अवसर हमारे जागने तक इंतजार नहीं करेंगे।हमें जब यह पता हो कि योग्यता हमसे कोसौ दूर है तो फिर निठल्ले बैठे रहने से यह ज्यादा बेहतर है कि जो अवसर नजर आए बिना किसी झिझक के काम में जुट जाएं, कम से कम ईश्वर ने हमें दुनिया देखने के लिए नजर तो दी है इन्हीं नजरों से हम यह भी देख सकते हैं कि कमाऊ सदस्यों और समाज की नजरों में कितनी उपेक्षा का भाव होता है । तभी कहा भी जाता है काम के ना काज के, ढाई सेर अनाज के।

Monday, 26 July 2010

काम जितनी राम राम!

हमसे आगे हमारा स्वार्थ तेज कदमों से चलता है लिहाजा सामने जो भी आता है हम मन की तराजू पर उसे तौलने लग जाते हैं कि वह आदमी हमारे आज काम आएगा या कल। जितना वह आदमी हम हमारे काम का लगता है उसे उतना ही सम्मान देते हैं। यदि काम का नहीं है तो किक मार देते हैँ । फुटबाल के मैदान में तो किक सही लग जाए तो गोल हो जाता है लेकिन आम जिंदगी में किक मारने की यह आदत हमें लोगो की नजर से गिरा भी सकती है।
अभी फीफा कप का जुनून चलता रहा। फुटबॉल देखते वक्त ऐसा लगता है कि हम सब की जिंदगी भी फुटबॉल की तरह ही है। कुछ लोग हमेें और हम किसी और को ताउम्र किक ही तो मारते रहते हैं। जब किक सही लग जाती है तो सफलता का गोल हमारे खाते में दर्ज हो जाता है।
खेल चाहे क्रिकेट, फुटबॉल या खो खो ही क्यों ना हो किसी भी खेल में सफलता टीम के सदस्यों के समान सहयोग से ही मिलती है असफलता के कारणों में चाहे कोई एक खिलाड़ी की चूक रहे लेकिन टीम के बाकी सदस्य उसे सूली पर चढ़ाने जैसे भाव नहीं दर्शाते। खेलों में जो टीम भावना नजर आती है क्या वह हम अपनी जिंदगी और कार्य क्षेत्र में तलाश पाते हैं, शायद नहीें। हम समाज का हिस्सा हैं लेकिन बिना समाज के हम कुछ भी नहीं यह बात हम आसानी से तभी समझ पाते हैं जब हम इस तरह के हालातों से गुजरते हैं। जिस तरह एक हेयर कटिंग सैलून का संचालक खुद की कटिंग नहीं कर सकता उसी तरह जटिलतम आपरेशन करने वाला डाक्टर भी अपनी पीठ पर उभरे फोड़े का अपने हाथों आपरेशन नहीं कर सकता।
इस असलियत को समझने के बावजूद हम लोग ना जाने किस भ्रम में जीते हैं। हम लोगों से किक मारने की स्टाइल में व्यवहार करते हैं। हमें लगता है जो कभी हमारे काम नहीं आ सकता उसे फुटबॉल की तरह किक मार भी दें तो अपना क्या बिगडऩा है। ऐसा करते वक्त यह भी याद नहीं रहता कि अब दुनिया इतनी छोटी हो गई है कि अगले मोड़ पर उसी व्यक्ति से काम पड़ सकता है जिसे कुछ समय पहले ही किक मारी थी। समझदार दुकानदार दुकान के सामने कटोरा लेकर खड़े भिखारी को छुट्टे पैसे डाल कर पुण्य तो कमाता ही है और चिल्लर का संकट पडऩे पर इन्हीं से कमीशन पर चिल्लर भी ले लेता हैं।
जिसे हम कुछ नहीं समझ कर तिरस्कृत करते हैं हमेंं पता नहीं उसे हम एक अनुभव मुप्त में देते हैं। हम जिस भी तरीके से उसे उपेक्षित करें उसे हमारा अंदाज तो पता चल ही जाता है। किसी को इतना भी उपेक्षित और तिरस्कृत ना किया जाए कि वह और आक्र ामक होकर सामने आए। पवित्र नर्मदा नदी के संबंध में प्रचलित है कि नर्मदा का कंकर भी शंकर है। दरअसल नर्मदा के तेज प्रवाह में पहाड़ी क्षेत्रों से पत्थर बह कर आते हैं और लगातार किनारों और चट्टानों से टकरा कर घिसते-घिसते गोलाकार हो जाते हैं। चूंकि घर के पूजा कक्ष में अंगूठे से कम आकार के शिवलिंग रखे जाते हैं इसलिए जो भी श्रद्धालु नर्मदा स्नान को जाते हैं लौटते में अपने साथ कंकर बने शंकर को पूजन के लिए साथ ले आते हैँ। उपेक्षा, हिकारत, से उपजी संघर्ष क्षमता ही कंकर को भी शंकर बना देती है।
हमारा स्वार्थ हम से आगे चलता है इसलिए हम मन की तराजू पर लोगों का वजन करते चलते हैं कौन अभी काम आ सकता है, कौन कल काम आएगा और कौन छह महीने बाद उपयोगी हो सकता है। हमारे काम मुताबिक ही हम मान सम्मान की मात्रा भी तय करते हैं। यदि चाय पिलाने मात्र से काम निकल सकता हो तो हम झूठे मुंह ही सही खाने का पूछने की जहमत नहीं उठाते। जो कल काम आ सकता है उसके लिए हमारे मन में आज मान सम्मान नहीं उमड़ता और आज जो हमारे काम आ गया उसे कल तक याद रखें यह जरूरी नहीं लगता।
मतलब नहीं हो तो हम किक मारने में देरी नहीं करते और काम अटका हुआ हो तो पैरों में लौटने में भी हमें अपमान महसूस नहीं होता। हम जब लोगों से काम निकालने जितने संबंध रखेंगे तो लोग भी अपना काम छोड़कर हमसे नहीं मिलेंगे। फुटबॉल सिखाता तो यही है कि गोल करने या टीम को जिताने के लिए साझा प्रयास जरूरी होते हैं। अकेला खिलाड़ी सोच ले कि वह टीम को जिता देगा तो यह संभव नहीं। टीम के बाकी सदस्य अच्छा खेलें और कोई एक सदस्य सहयोग न करे तो भी जीत संभव नहीं।

Thursday, 15 July 2010

हमें बोलना आता है?

वैसे तो हम जन्म के एक डेढ़ साल बाद ही मा मा, पा पा, गा गा बोलना सीख गए थे लेकिन हम में से कई लोग पापा, मम्मी बन जाने के बाद भी कब, कहां, क्या, कितना बोलना और कब चुप रहना यह सीख नहीं पाते। कभी जब हमारा कोर्ट-कचहरी से वास्ता पड़े तो समझ आ जाता है कम से कम बोलना कितना फायदेमंद और निर्रथक बोलना कितनी परेशानी का कारण बन सकता है।
बंदरों के हमले से बचने के चक्कर में वो सज्जन सीढिय़ों के किनारे गिर पड़े थे। कुछ लोग उनकी मदद के लिए दौड़े । वहीं रहने वाले एक सज्जन घर की गैलरी से सारा नजारा देख रहे थे। उन्होंने पहले पूछा चोट ज्यादा तो नहीं लगी, फिर घुटने की चोट पर लगाने के लिए रुई और मरहम लेकर आ गए। यह सारी गतिविधि चल ही रही थी कि भीड़ में खड़े एक युवक ने सांत्वना देते हुए कहा यह अच्छा हुआ कि बंदरों ने काटा नहीं।
उसकी बात थी तो सही लेकिन आसपास खड़े लोगों ने उसे घूर कर देखा क्यों कि सांत्वना व्यक्त करने का यह अंदाज उन लोगों को ठीक नहीं लगा। एक ने तो तुरंत कह भी दिया कि एक तो बेचारा वह घायल आदमी वैसे ही दर्द से कराह रहा है और आप हैं कि कह रहे हैं अच्छा हुआ बंदरों ने काटा नहीं। इन दोनों के बीच तकरार की नौबत आए इससे पहले ही अन्य लोगों ने बात संभाल ली।
कितनी अजीब बात है न, जन्म के करीब एक साल बाद बच्चा मा मा, ना ना, पा पा जैसे शब्द बोलना सीख जाता है और कु छ ही वर्षों में फर्राटे से घरेलू भाषा सहित अन्य भाषाएं भी बोलने लग जाता है, लेकिन क्या वजह है कि हममें से ज्यादातर लोग उम्र के अंतिम पड़ाव तक यह सीख ही नहीं पाते कि कब, कौन से शब्द बोलना और कहां चुप रहना है। समझदार आदमी वही होते हैंं जो विवादास्पद मामलों में देश, काल, परिस्थिति और खुद की स्थिति का आकलन कर चुप्पी साध लेते हंै।
बढ़ती महंगाई के इस जमाने में हमें पेट्रोल, कुकिंग गैस, खाने की चीजों के बढ़ते दाम की चिंता तो है, इन सारी चीजों में हम किफायत बरतते हैं लेकिन शब्दों की फिजूलखर्ची के मामले में हम किसी बिगड़े नवाब से कम नहीं। आपातकाल में जरूर बोलने पर पाबंदी लगी थी। उस बात को भी 33 साल हो गए। शब्दों पर चूंकि कोई टैक्स भी नहीं लगता इसलिए बिना आगा-पीछा सोचे मन में जो आता है बोलते रहते हैं। जब आपातकाल लगा हुआ था तब कु छ भी बोलने से पहले दस बार सोच लेते थे कि कहीं मुंह से ऐसा कुछ न निकल जाए कि बेमतलब जेल की हवा खानी पड़ जाए।
गीत तो यह है कि 'जो तुम को हो पसंद वही बात कहेंगेÓ, लेकिन हम अपनी कहने में जितनी उदारता बरतते हैं दूसरे को सुनते वक्त उतना संयम और साहस नहीं दिखा पाते। कारण यह है कि हमें मीठा खाना, मीठा सुनना ही अच्छा लगता है। यह तो भला हो डायबिटीज का कि लोगों को मजबूरी में मीठे से परहेज करना पड़ रहा है। फिर भी अपने विषय में कड़वा सुनना दिल वालों के बस की ही बात है। जो लोगों की बात सुनने जितना संयम भी नहीं दिखाता उसे लोग मन ही मन नकार देते हैं।
जब आपकी बात कोई पूरी सुनता है तो हममें भी यह धैर्य होना ही चाहिए कि हम सामने वाले को इत्मीनान से सुने। हम में चूंकि धैर्य नहीं रहता इसलिए या तो हम पूरी बात सुनते नहीं या पहले से ही सामने वाले के संबंध में धारणा बना लेते हैं जो बाद में गलत साबित होने पर मन ही मन पश्चाताप के अलावा हमारे सामने कोई चारा भी नहीं बचता। इस पश्चाताप की आग में झुलसने से बचने का वैसे तो आसान तरीका हम सब को पता भी होता है लेकिन हम साफ मन से माफी मांगने या जो मन में धारणा बना ली थी वह सच्चाई कहने का साहस भी नहीं जुटा पाते।
कब बोलें, कब चुप रहें, अनर्गल न बोलें, बोलते वक्त वाणी में संयम किस तरह रखें, गुस्से में, ऊंचे स्वर में न बोलें, जितना पूछा जाए उतना ही बोलें आदि सुनने और बोलने के फायदे क्या हो सकते हैं यह कोर्ट में किसी मामले की सुनवाई क ा साक्षी होने पर समझ आ सकता है। दोनों पक्षों को अपनी बात कहने, तर्क और प्रमाण प्रस्तुत करने का पर्याप्त मौका देने के बाद ही न्यायाधीश अंत में फैसला सुनाते हैं। ज्यादातर मामलों में यह फैसला दोनों पक्षों को मान्य भी होता है।
फैसला मान्य करने वाले दोनों पक्षों में से एक पक्ष फैसले से असंतुष्ट हो सकता है लेकिन उसे भी यह संतोष रहता है कि उसे इत्मीनान से सुना गया। और हम लोग हैं कि किसी का काम करना तो दूर उसे इत्मीनान से सुनते भी नहीं। जाहिर है ऐसे में वह व्यक्ति हमारी तारीफ तो नहीं करेगा।